चालीसा संग्रह :: चालीसा संग्रह

चालीसा संग्रह

चालीसा संग्रह

रामायण में सच्चरित्रवान् पात्र अनेक हैं। इसमें पवनपुत्र श्री हनुमान जी की सुन्दर स्तुति की गई है जो श्री हनुमान चालीसा के नाम से प्रसिद्ध है। इसके गंभीर भावों पर विचार करने से मन में श्रेष्ठ ज्ञान के साथ भक्तिभाव जाग्रत होता है।

गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमान चालीसा की शुरुआत दो दोहों और गुरु के स्मरण से की है। लिखा है कि-
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिक सुमिरौ पवन कुमार।
बल, बुद्धि, विद्या देहु मोहि हरहु क्लेश विकार।।
अर्थ है - श्री गुरु के चरण कमलों की रज से अपने मन रूपी दर्पण को साफ कर मैं श्री रघुनाथ के उस पावन यश का वर्णन करता हूं, जो चारों फलों यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला है।
तुलसीदासजी ने दोहे की शुरुआत पहले गुरु को स्मरण कर की है।

अनमोल विचार

शैलपुत्री (Shailputri)

शैलपुत्री

ब्रह्मचारिणी (Brahmcharini)

ब्रह्मचारिणी

चंद्रघंटा (Chandraghanta )

चंद्रघंटा

कूष्माण्डा (Kushmanda)

कूष्माण्डा

स्कन्दमाता(Sakandmata)

स्कन्दमाता

कात्यायनी (Katyayni)

कात्यायनी

कालरात्रि (Kaalratri)

कालरात्रि

महागौरी (Mahagauri)

महागौरी

सिद्धीदात्री (Sidhidatri)

सिद्धीदात्री