नवग्रह मंत्र संग्रह :: कूष्माण्डा चतुर्थकम्

कूष्माण्डा चतुर्थकम्

नवग्रह मंत्र

दुर्गा पूजा शक्ति उपासना का पर्व है। नवरात्र में मनाने का कारण यह है कि इस अवधि में ब्रह्मांड के सारे ग्रह एकत्रित होकर सक्रिय हो जाते हैं, जिसका दुष्प्रभाव प्राणियों पर पड़ता है। ग्रहों के इसी दुष्प्रभाव से बचने के लिए नवरात्रि में दुर्गा की पूजा की जाती है।दुर्गा दुखों का नाश करने वाली देवी है। इसलिए नवरात्रि में जब उनकी पूजा आस्था, श्रद्धा से की जाती है तो उनकी नवों शक्तियाँ जागृत होकर नवों ग्रहों को नियंत्रित कर देती हैं। फलस्वरूप प्राणियों का कोई अनिष्ट नहीं हो पाता। दुर्गा की इन नवों शक्तियों को जागृत करने के लिए दुर्गा के 'नवार्ण मंत्र' का जाप किया जाता है। नव का अर्थ नौ तथा अर्ण का अर्थ अक्षर होता है।

कूष्माण्डा चतुर्थकम्
अगर आपकी संतान सुखी नहीं है। विवाह के कई वर्षों बाद भी आंगन में किलकारी नहीं गूंज रही है, तो नवदुर्गा के चौथे स्वरुप मां कूष्माण्डा की पूजा करें। ऐसे करके आपको संतान सुख की प्राप्ति होगी।
मां कूष्माण्डा का संतान सुख मंत्र
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।।
मां कूष्माण्डा को अनार के रस का भोग लगायें।

मंत्र : कूष्माण्डा
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च ।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥

कूष्माण्डा:- मां दुर्गा का चौथा स्वरूप

माँ दुर्गा का चतुर्थ स्वरूप कुष्मांडा है| नवरात्रि में चौथे दिन इसी स्वरूप की पूजा की जाती है |

माता कुष्मांडा के आठ भुजाएं हैं, इनके हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमल, अमृत-कलश, चक्र, गदा, जप माला शोभायमान है | माता कुष्मांडा का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़ अत्यंत प्रिय है| संस्कृत में कुम्हड़े को कुष्मांड कहते है इसलिए इनका नाम कुष्मांडा है | चतुर्थ दिन में साधक “अदाहत” चक्र में स्थित होता है |

स्तुति मंत्र :-

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कुष्मांडा रूपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ||

मूलमंत्र:- माता कुष्मांडा की आराधना हेतु मंत्र इस प्रकार है -

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च |
दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्मांडा शुभदास्तु मे ||

अनमोल विचार