अदभुत धार्मिक स्थल:: पाताली हनुमान्

पाताली हनुमान्

उत्तरप्रदेश के हमीरपुर का "पाताली-हनुमान्" मन्दिर । यह अत्यन्त पवित्र स्थान माना जाता है, मान्यता है कि यहाँ हनुमान् जी स्वयं प्रकट हुए थे, वे सभी भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं । श्रद्धालुओं की रक्षा, साधकों के शत्रुओं का शमन करते हैं, विवाह में आ रही बाधाएँ दूर करते है इत्यादि मान्यताओं के चलते श्रद्धालुओं की उस पावन धाम के प्रति अगाध आस्था है ।
इस मन्दिर के बारे में जो उपरोक्त मान्यताएँ हैं, उन्हें दर्शनार्थी अनुभूत बताते हैं । श्रद्धालु बताते हैं कि वर्षों पूर्व यहाँ प्रतिष्ठित हनुमान् की मूर्ति पाताल से जरा-सी निकली थी, जो शनैः-शनैः बढ़ती जा रही हैं । एक न्यूज चैनल के अनुसार मन्दिर के पुजारी अन्नी बाबा का कहना है कि इस मन्दिर की मूर्ति पाताल के भीतर किसनी है, इसकी नाप आज तक कोई भी नहीं ले सका । हालाँकि इसके लिए कई विशेषज्ञों ने प्रयास किया है । न ही, इस सवाल का कोई उत्तर खोज सका है कि यह मूर्ति निरन्तर बड़ी क्यों हो रही है ? श्रद्धालुओं के अनुसार वह चमत्कारिक मूर्ति पाताल में गहरे तक हो सकती है, जो धीरे-धीरे बाहर आ रही हैं

रामेश्‍वरम के विशाल मंदिर को बनवाने और उसकी रक्षा करने में रामनाथपुरम नामक छोटी रियासत के राजाओं का बड़ा हाथ रहा. अब यह रियासत तमिलनाडु राज्य में मिल गई है. रामनाथपुरम के राजभवन में एक पुराना काला पत्थर रखा हुआ है. कहा जाता है कि यह पत्थर राम ने केवटराज को राजतिलक के समय उसके चिन्ह के रूप में दिया था. रामेश्‍वरम की यात्रा करने वाले लोग इस काले पत्थर को देखने के लिए जाते हैं. रामेश्‍वर के मंदिर में जिस प्रकार शिवजी की दो मूर्तियां हैं, उसी प्रकार देवी पार्वती की भी मूर्तियां अलग-अलग स्थापित की गई हैं. देवी की एक मूर्ति पर्वतवर्द्धिनी कहलाती है, दूसरी विशालाक्षी. मंदिर के पूर्व द्वार के बाहर हनुमान की एक विशाल मूर्ति अलग मंदिर में स्थापित है. सेतुमाधव कहलाने वाले भगवान विष्णु का मंदिर भी प्रमुख है. इस मंदिर की स्थापना से जुड़ी एक रोचक कहानी यह है कि राम ने पहले सागर से प्रार्थना की और कार्य सिद्ध न होने पर धनुष चढ़ाया, तो सागर प्रकट हुआ, जिसके कारण इसकी स्थापना की गई. कहीं पर सीताजी ने अग्नि-प्रवेश किया था, तो किसी अन्य स्थान पर श्रीराम ने जटाओं से मुक्तिपाई थी. ऐसी सैकड़ों कहानियां प्रचलित हैं. यहां राम-सेतु के निर्माण में लगे ऐसे पत्थर भी मिलते हैं, जो पानी पर तैरते रहते हैं. मान्यता है कि नल-नील नामक दो वानरों ने उनको मिले वरदान के कारण जिस पाषाण शिला को भी छुआ, वह पानी पर तैरने लगी और सेतु के काम आई. यहां कुछ और भी महत्वपूर्ण तीर्थ हैं-

श्रद्धालु बताते हैं कि पाताली हनुमान् जी के दर्शन से भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती है । इतना जरुर है कि अभीष्ट कार्य होने के बाद भक्त अपनी मनौती के अनुसार प्रसाद के साथ एक घण्टी भी चढ़ाते हैं । वर्तमान में प्रतिदिन पाताली हनुमान् जी के दर्शन के लिए भक्त आते हैं, लेकिन मंगलवार और शनिवार को यहाँ मेला-सा भरता ह ।
मान्यता है कि द्वापर युग में पाण्डवों ने जब वनवास के दौरान प्रकट हुई हनुमान् जी की चमत्कारिक मूर्ति को देखा, तब उन्होंने वहाँ मन्दिर बनवाया । शनैः-शनैः मन्दिर की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई ।

उज्जैन में भी है पाताल से प्रकट हनुमान् जी
महाकाल की नगरी उज्जैन में भी एक हनुमान् मन्दिर की मूर्ति आधी बाहर तथा आधी जमीन में समाई हुई है । उन्हें देख कर लगता है कि रामभक्त हनुमान् पाताल से निकल रहे हैं । यह मूर्ति नृत्य करते हुए हनुमान् जी की हैं । इसलिए इस मन्दिर को नृत्याकार हनुमान् मन्दिर कहते हैं ।
जब अहिरावण भगवान् श्रीराम तथा लक्ष्मण जी को उठा कर पाताल में ले गया था, तब हनुमान् जी ने वहाँ जाकर उन्हें मुक्त करवाया था । इसलिए यह मूर्ति आधी जमीन में समाई हुई है । कुछ श्रद्धालुओं का मानना है कि श्रीराम व लक्ष्मण जी को अहिरावण के बन्धन से मुक्त करवाने की खुशी में हनुमान् जी रामधुनी गाते हुए झूमे-नाचे थे ।
इसी कारण उनकी मूर्ति की नृत्य मुद्रा है । नृत्याकार हनुमान् जी के मूँगफली और चिरौंजी का प्रसाद चढ़ता है । श्रद्धालु बताते हैं कि जिनकी मनोकामना पूर्ण होती है, वे भक्त तो अपनी बोलमा (मनौती) के अनुसार प्रसाद चढ़ाते ही हैं, आम भक्त भी यही प्रसादी लाते हैं ।

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