मुख्य धार्मिक स्थल :: मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

ज्योतिर्लिंगों में मल्लिकार्जुन का दुसरे स्थान पर है , मल्लिका माँ पार्वती और अर्जुन अर्थात शिव | अत: यह धाम शिव शक्ति का पावन स्थान है | यह आन्ध्र प्रदेश के कृष्णा ज़िले में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल पर्वत पर श्रीमल्लिकार्जुन विराजमान हैं। हैदराबाद से लगभग 200 किलोमीटर दूर इस स्थान को दक्षिण का कैलाश कहते हैं। । महाभारत शिवपुराण में इस स्थान की शिव महिमा का गुणगान किया गया है। यही भ्रमराम्बा देवी के रूप में महाशक्ति विराजित है जिनके दर्शनों का सुख भक्तो को प्राप्त होता है | शिव और शक्ति के दोनों रुप स्वयंभू है मल्लिकार्जुन धाम में |

इस ज्योतिर्लिंग के पूजा अभिषेक या दर्शन मात्र से मनुष्य अपने सभी दुखो से निजात पा लेता है । मल्लिकार्जुन की पूजा से संतान प्राप्ति और सभी सुख प्राप्त होते है | ग्रन्थ बताते है की श्रीशैल के शिखर के दर्शन मात्र करने से दर्शको के सभी प्रकार के दुःख दूर हो जाते है , उनपर शिव शक्ति की अशीम कृपा बनी रहती है | अनन्त सुखों की प्राप्ति होती है और शिवपद प्राप्त करके मोक्ष को पाया जाता है |

ज्योतिर्लिंग के प्रकट होने की कथा :
पुराणों में इस ज्योतिर्लिंग की कथा इस प्रकार से है।

एक समय की बात है, भगवान शिवजी के दोनों पुत्र श्रीगणेश और श्रीकार्त्तिकेय स्वामी विवाह के लिए परस्पर झगड़ने लगे। दोनों चाहते थे की सबसे पहले विवाह उनका हो | जब यह बात उनके माता पिता तक पहुंची तब उनसे कहा गया की जो सबसे पहले पृथ्वी का चक्कर पूर्ण करने में सफल रहेगा वही विजयी घोषित किया जायेगा | यह सुनकर श्रीकार्त्तिकेय स्वामी अपनि सवारी मयूर पर विराजित होकर परिकर्मा के लिए रवाना हो गये | इधर श्री गणेश जी का वाहन मूषक (चूहा) था | इस तरह इस कार्य में उनकी जीत असंभव थी | पर श्री गणेश जी बड़े चतुर और बुद्धिमान है | इसलिए उन्होंने मूषक पर सवार होकर अपने माँ और पिता के ही चारो तरफ चक्कर लगाकर अपनी परिकर्मा को पूर्ण बता दिया |

माँ पार्वती और शिवजी यह देखकर बड़े चकित हुए और उनसे ऐसा करने का कारण पूछा तब श्री गणेश ने बड़े ही भोले भाले रूप में यह कहा की माँ पिता ही मेरे लिए समस्त जगत के बराबर है | आप दोनों के चक्कर लगाना ही मेरे लिए पृथ्वी के चक्कर लगाने के समान है |

इस बात से और इसके पीछे छिप्पी सत्यता से सभी खुश और संतुष्ट हुए और श्री गणेश को विजयी घोषित कर दिया गया | उन्हें प्रथम पूज्य देवता का वरदान भी प्राप्त हुआ |

गणेशजी का ‘सिद्धि’और ‘रिद्धि’ नाम वाली दो कन्याओं के साथ विवाह हो चुका था और उन्हें ‘क्षेम’ तथा ‘लाभ’ नामक दो पुत्र भी प्राप्त हो चुके थे। तब कार्त्तिकेय जब लौटे तब अत्यंत रुष्ट होकर क्रौञ्च पर्वत पर चले गए।

माता पिता के लाख समझाने के बाद भी वो लौटे नही अपितु वहा से 12 कोस दूर चले गए तब भगवान शिव और माता पार्वती वही पर पुत्र स्नेह के कारण स्थापित हो गए। वर्णित है की अमावस्या के दिन भोले बाबा और पूर्णिमा के दिन माता पार्वती पुत्र कार्तिकेय से मिलने जाती थी।

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