विशेष धार्मिक स्थल :: गोरखपुर में गुरु गोरखनाथ का प्राचीन मंदिर

गोरखपुर में गुरु गोरखनाथ का प्राचीन मंदिर

गोरखनाथ अथवा गोरक्षनाथ मंदिर नाथ संप्रदाय का प्रमुख केन्द्र है। हिन्दू धर्म, दर्शन, अध्यात्म और साधना के अंतर्गत विभिन्न संप्रदायों और मत-मतांतरों में 'नाथ संप्रदाय' का प्रमुख स्थान है। संपूर्ण देश में फैले नाथ संप्रदाय के विभिन्न मंदिरों तथा मठों की देख रेख यहीं से होती है। नाथ सम्प्रदाय की मान्यता के अनुसार सच्चिदानंद शिव के साक्षात् स्वरूप 'श्री गोरक्षनाथ जी' सतयुग में पेशावर (पंजाब) में, त्रेतायुग में गोरखपुर, उत्तरप्रदेश, द्वापर युग में हरमुज, द्वारिका के पास तथा कलियुग में गोरखमधी, सौराष्ट्र में आविर्भूत हुए थे। चारों युगों में विद्यमान एक अयोनिज अमर महायोगी, सिद्ध महापुरुष के रूप में एशिया के विशाल भूखंड तिब्बत, मंगोलिया, कंधार, अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, सिंघल तथा सम्पूर्ण भारतवर्ष को अपने योग से कृतार्थ किया।

हरि के प्रदेश हरियाणा की पावन धरती पर अनेक धार्मिक स्थल बने हुए हैं। हरियाणा में अलग-अलग क्षेत्र के निवासियों का अलग-अलग धार्मिक स्थलों के प्रति अटूट विश्वास एवं अगाध आस्था है। श्रद्धालु मान्यता के अनुसार अपने इष्ट की आराधना करते हैं और मन्नत मांगते हैं। हरियाणा में स्थित धार्मिक स्थल आपसी भाईचारे एवं सौहार्द के प्रतीक हैं। फतेहाबाद के गांव गोरखपुर में बना गुरु गोरखनाथ का प्राचीन मंदिर गोरखनाथ का धूणा पूरे उत्तरी भारत में प्रसिद्ध है।

यहां विशिष्ट अवसरों पर दूर-दराज से असंख्य श्रद्धालु धोक लगाने पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां आकर मांगी गई हर मुराद अवश्य पूरी होती है। यही कारण है कि श्रद्धालु साल में एक बार तो गुरु गोरखनाथ मंदिर में स्थित गोरखनाथ की कच्ची मढी पर माथा अवश्य टेकते हैं। गांव गोरखपुर के बुजुर्ग निवासियों का कहना है कि इस गांव का नाम गुरु गोरखनाथ के कारण ही गोरखपुर पडा है।

गुरु गोरखनाथ के भक्तों का मानना है कि गुरु गोरखनाथ ने भ्रतृहरिको अपना शिष्य बनाया था जो अपना राज्य अपने भाई विक्रमादित्यको सौंपकर योगी बन गए थे। उन्हीं के समकालीन गोरखपुर का ये डेरा माना जाता है। गुरु गोरखनाथ ने सबसे पहले गांव में जाल के पेड के नीचे तपस्या शुरू की थी। वहीं पर अब गुरु गोरखनाथ की कच्ची मढी बनी है। यहां हर रविवार को मेले का आयोजन होता है। इस दिन असंख्य श्रद्धालु गुरु गोरखनाथ की कच्ची मढी पर जोत लगाकर धोक लगाते हैं और मन्नत मांगते हैं। जब यह मढी बनी थी तब सिवाचगोत्र के लोगों ने गुरु गोरखनाथ की मढी पर आकर सेवा शुरू की।

अब गोरखपुर के गुरु गोरखनाथ मंदिर में साल में दो बार महारूद्रयज्ञ होता है। मंदिर के महंत दशरथनाथ योगी का कहना है कि सावन व फाल्गुन शिवरात्रि के दिन महारूद्र पूर्णाहुति होती है। अपने-अपने समय में यहां रहे संतों ने महारूद्र यज्ञ करवाया। बाबा मंगलनाथ ने 14 बार, बाबा हनुमाननाथ ने तीन बार, बाबा मोहननाथ ने एक बार, बाबा संजयनाथ ने 16बार, बाबा गणेशनाथ ने तीन बार, बाबा भोरनाथ ने एक बार और वर्तमान में गद्दीनशीन महंत बाबा दशरथनाथ ने 38बार महारूद्र यज्ञ करके पूरे वातावरण को शुद्ध बनाने में विशेष योगदान दिया। इन सभी अवसरों पर श्रद्धालुओं ने भी बढ-चढकर शिरकत की और अपनी तरफ से हर संभव सहयोग किया। गोरखनाथ मंदिर के परिसर में पंचमुखी हनुमान, दुर्गा मां, विष्णु लक्ष्मी, श्रीकृष्ण, गायत्री, काली, भैरव, रामदेव, शनिदेव, शिवशंकर भोलेनाथ एवं गोरखपुरियाबैल प्रतिष्ठित हैं। श्रद्धालु इन्हें देखकर भक्ति भावों में डूबकर इनकी पूजा-अर्चना करने लगते हैं।

श्रद्धालुओं का मानना है कि गांव गोरखपुर के पूर्व में स्थित गोरखनाथ कुई में स्नान करने से सभी चर्म रोग दूर हो जाते हैं। इस कुई पर हर अमावस के दिन आसपास व दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु स्नान करने पहुंचते हैं। गांव की कुंआरी कन्याएं कात्तक स्नान के लिए अल सुबह गीत गाते हुए इसी कुई पर पहुंचती हैं। श्रद्धालुओं का कहना है कि जब गुरु गोरखनाथ यहां तप करते थे तो यहां पानी की बहुत किल्लत रहती थी। इस समस्या के समाधान के लिए ही गुरु गोरखनाथ ने अपने चिमटे से जमीन खोदकर यहां कुई का निर्माण किया था। यह कुई शुरू से ही श्रद्धालुओं की अगाध आस्था की केंद्र है। एक बार इस कुई में मोर, बिल्ली व एक बछिया गिर गए थे। ये तीनों ही सकुशल बाहर निकाल लिए गए थे। श्रद्धालुओं की यह आस्था है कि ये तीनों गुरु गोरखनाथ की असीम कृपा से जीवित बाहर आ गए थे। पूरे हरियाणा में एक कहावत है कि ब्याह शादी व अन्य कार्यक्रममें यदि कोई कार्य होने में देरी करें तो कहा जाता है कि आज्या नैंक्यूं गोरखपुरिया बलद होग्या।दरअसल गांव गोरखपुर में पंडित देवतरामके घर गाय ने एक बछडे को जन्म दिया। वह बछडा घर से बाहर नहीं निकलता था और दुधिया पानी पीकर अपनी प्यास बुझाता था। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय यह बछडा अपने आगे के दो पैर बाहर निकालता और फिर वापस पीछे कर लेता। जब यह बछडा बडा होकर यानी बैल (बलद) बनकर परलोक सिधारा था तो सूर्यास्त होने वाला था। श्रद्धालु अब इस बैल की पूजा-अर्चना भी करते हैं। पिछले 12साल से मंदिर परिसर में बनी गोशाला में गायों की सेवा-संभाल की जा रही है।

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