स्तुति संग्रह :: स्त्रोत्र संग्रह

स्त्रोत्र संग्रह

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पूजन में जो त्रुटि रह जाती है, आरती से उसकी पूर्ति होती है। पूजा के अंत में हम सभी भगवान की आरती करते हैं। आरती पूजन के अन्त में इष्टदेवता की प्रसन्नता के हेतु की जाती है। इसमें इष्टदेव को दीपक दिखाने के साथ उनका स्तवन तथा गुणगान किया जाता है। यह एक देवता के गुणों की प्रशंसा गीत है। आरती आम तौर पर एक पूजा या भजन सत्र के अंत में किया जाता है। यह पूजा समारोह के एक भाग के रूप में गाया जाता है।साधारणत: पाँच बत्तीयों से आरती की जाती है, इसे ' पंचप्रदिप' भी कहते है। एक सात या उससे भी अधिक बत्तीयों से भी आरती की जाती है। कपूर से भी आरती होती है। कुमकुम, अगर, कपूर धुत और चन्दन, पाँच बत्तीयों अथवा दीए की ( रुई और घी की ) बत्तियाँ बनाकर शंख, घंटा आदि बजाते हुआ आरती करनी चाहिए।

आरती को लेकर हमारे 'स्कंदपुराण' में भी कहा गया है- मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यत् पूजनं हरेः । सर्वे संपूर्णतामेति कृते नीराजने शिवे।। अर्थात् – पूजन मंत्रहीन और क्रियाहीन होने पर भी नीराजन आरती कर लेने से उसमें सारी पूर्णता आ जाती है। आरती करने का ही नहीं, आरती देखने का भी बड़ा पुण्य होता है। जो धूप और आरती को देखता है और दोनों हाथों से आरती लेता है, वह समस्त पीदियों का उद्धार करता है और भगवान् विष्णु के परमपत को प्राप्त होता है।

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