विनयपत्रिका :: गोस्वामी तुलसीदास कृत विनयपत्रिका

गोस्वामी तुलसीदास कृत विनयपत्रिका

विनयपत्रिका २१०-२१९

२१०
औरु कहँ ठौरु रघुबंस-मनि! मेरे । पतित-पावन प्रनत-पाल असरन-सरन, बाँकुरे बिरुद बिरुदैत केहि केरे ॥ १ ॥ समुझि जिय दोस अति रोस करि राम जो, करत नहिं कान बिनती बदन फेरे । तदपि ह्वे निडर हौं कहौं करुना-सिंधु, क्योंऽब रहि जात सुनि बात बिनु हेरे ॥ २ ॥ मुख्य रुचि बसिबेकी पुर रावरे, राम! तेहि रुचिहि कामादि गन घेरे । अगम अपबरग, अरु सरग सुकृतैकफल, नाम-बल क्यों बसौं जम-नगर नेरे ॥ ३ ॥ कतहुँ नहिं ठाउँ, कहँ जाउँ कोसलनाथ! दीन बितहीन हौं, बिकल बिनु डेरे । दास तुलसिहि बास देहु अब करि कृपा, बसत गज गीध ब्याधादि जेहि खेरे ॥ ४ ॥
२११
कबहुँ रघुबंसमनि ! सो कृपा करहुगे । जेहि कृपा ब्याध, गज, बिप्र, खल नर तरे, तिन्हहि सम मानि मोहि नाथ उद्धरहुगे ॥ १ ॥ जोनि बहु जनमि किये करम खल बिबिध बिधि, अधम आचरन कछु हृदय नहि धरहुगे । दीनहित! अजित सरबग्य समरथ प्रनतपालि, चित मृदुल निज गुननि अनुसरहुगे ॥ २ ॥ मोह-मद-मान-कामादि खलमंडली, सकुल निरमूल करि दुसह दुख हरहुगे । जोग-जप-जग्य-बिग्यान ते अधिक अति, अमल दृढ़ भगति दै परम सुख भरहुगे ॥ ३ ॥ मंदजन-मौलिमनि सकल, साधनहीन, कुटिल मन, मलिन जिय जानि जो डरहुगे । दासतुलसी बेद-बिदित बिरुदावली, बिमल जस नाथ! केहि भाँति बिस्तरहुगे ॥ ४ ॥ राग केदारा
२१२
रघुपति बिपति-दवन । परम कृपालु, प्रनत-प्रतिपालक, पतित-पावन ॥ १ ॥ कूर, कुटिल, कुलहीन,दीन,अति मलिन जवन । सुमिरत नाम राम पठये सब अपने भवन ॥ २ ॥ गज-पिंगला-अजामिल-से खल गनै धौं कवन । तुलसिदास प्रभु केहि न दीन्हि गति जानकी-रवन ॥ ३ ॥

२१३
हरि-सम आपदा-हरन । नहि कोउ सहज कृपालु दुसह दुख-सागर-तरन ॥ १ ॥ गज निज बल अवलोकि कमल गहि गयो सरन । दीन बचन सुनि चले गरुड़ तजि सुनाभ-धरन ॥ २ ॥ द्रुपदसुताको लग्यो दुसासन नगन करन । 'हा हरि पाहि' कहत पूरे पट बिबिध बरन ॥ ३ ॥ इहे जानि सुर-नर-मुनि-कोबिद सेवत चरन । तुलसिदास प्रभु को न अभय कियो नृग-उद्धरन ॥ ४ ॥ राग कल्यान
२१४
ऐसी कौन प्रभुकी रीति ? बिरद हेतु पुनीत परिहरि पाँवरनि पर प्रीति ॥ १ ॥ गई मारन पूतना कुच कालकूट लगाई । मातुकी गति दई ताहि कृपालु जादवराइ ॥ २ ॥ काममोहित गोपिकनिपर कृपा अतुलित कीन्ह । जगत-पिता बिरंचि जिन्हके चरनकी रज लीन्ह ॥ ३ ॥ नेमतें सिसुपाल दिन प्रति देत गनि गनि गारि । कियो लीन सु आपमें हरि राज-सभा मँझारि ॥ ४ ॥ ब्याध चित दै चरन मार यो मूढ़मति मृग जानि । सो सदेह स्वलोक पठयो प्रगट करि निज बानि ॥ ५ ॥ कौन तिन्हकी कहै जिन्हके सुकृत अरु अघ दोउ । प्रगट पातकरूप तुलसी सरन राख्यो सोउ ॥ ६ ॥
२१५
श्रीरघुबीरकी यह बानि । नीचहू सों करत नेह सुप्रीति मन अनुमानि ॥ १ ॥ परम अधम निषाद पाँवर, कौन ताकी कानि ? लियो सो उर लाइ सुत ज्यौं प्रेमको पहिचानि ॥ २ ॥ गीध कौन दयालु, जो बिधि रच्यो हिंसा सानि ? जनक ज्यों रघुनाथ ताकहँ दियो जल निज पानि ॥ ३ ॥ प्रकृति-मलिन कुजाति सबरी सकल अवगुन-खानि । खात ताके दिये फल अति रुचि बखानि बखानि ॥ ४ ॥ रजनिचर अरु रिपु बिभीषन सरन आयो जानि । भरत ज्यों उठि ताहि भैंटत देह-दसा भुलानि ॥ ५ ॥ कौन सुभग सुसील बानर, जिनहिं सुमिरत हानि । किये ते सब सखा, पूजे भवन अपने आनि ॥ ६ ॥ राम सहज कृपालु कोमल दीनहित दिनदानि । भजहि ऐसे प्षभुहि तुलसी कुटिल कपट न ठानि ॥ ७ ॥
२१६
हरि तज और भजिये काहि ? नाहिनै कोउ राम सो ममता प्रनतपर जाहि ॥ १ ॥ कनककसिपु बिरंचिको जन करम मन अरु बात । सुतहिं दुखवत बिधि न बरज्यो कालके घर जात ॥ २ ॥ संभु-सेवक जान जग, बहु बार दिये दस सीस । करत राम-बिरोध सो सपनेहु न हटक्यो ईस ॥ ३ ॥ और देवनकी कहा कहौं, स्वारथहिके मीत । कबहु काहु न राख लियो कोउ सरन गयउ सभीत ॥ ४ ॥ को न सेवत देत संपति लोकहू यह रीति । दासतुलसी दीनपर एक राम ही की प्रीति ॥ ५ ॥
२१७
जो पै दूसरो कोउ होइ । तौ हौं बारहि बार प्रभु कत दुख सुनावौं रोइ ॥ १ ॥ काहि ममता दीनपर, काको पतितपावन नाम । पापमूल अजामिलहि केहि दियो अपनो धाम ॥ २ ॥ रहे संभु बिरंचि सुरपति लोकपाल अनेक । सोक-सरि बूड़त करीसहि दई काहु न टेक ॥ ३ ॥ बिपुल-भूपति-सदहि महँ नर-नारि कह्यो 'प्रभु पाहि' । सकल समरथ रहे, काहु न बसन दीन्हों ताहि ॥ ४ ॥ एक मुख क्यों कहौं करुनासिंधुके गुन-गाथ ? भक्तहित धरि देह काह न कियो कोसलनाथ! ॥ ५ ॥ आपसे कहुँ सौंपिये मोहि जो पै अतिहि घिनात । दासतुलसी और बिधि क्यों चरन परिहरि जात ॥ ६ ॥
२१८
कबहि देखाइहौ हरि चरन । समन सकल कलेस कलि-मल ,सकल मंगल- करन ॥ १ ॥ सरद-भव सुंदर तरुनतर अरुन-बारिज-बरन । लच्छि-लालित-ललित करतल छबि अनूपम धरन ॥ २ ॥ गंग-जनक अनंग-अरि-प्रिय कपट-बटु बलि-छरन । बिप्रतिय नृग बधिकके दुख-दोस दारुन दरन . । ३ । सिद्ध-सुर-मुनि-बृंद-बंदित सुखद सब कहँ सरन । सकृत उर आनत जिनहिं जन होत तारन-तरन ॥ ४ ॥ कृपासिंधु सुजान रघुबर प्रनत-आरति-हरन । दरस-आस-पियास तुलसीदास चाहत मरन ॥ ५ ॥
२१९
द्वार हौं भोर ही को आजु । रटत रिरिहा आरि और न, कौर ही तें काजु ॥ १ ॥ कलि कराल दुकाल दारुन, सब कुभाँति कुसाजु । नीच जन, मन ऊँच जैसी कोढँमेंकी खाजु ॥ २ ॥ हहरि हियमें सदय बूझ्यो जाइ साधु-समाजु । मोहुसे कहुँ कतहुँ कोउ, तिन्ह कह्यो कोसलराजु ॥ ३ ॥ दीनता-दारिद दलै को कृपाबारिधि बाजु । दानि दसरथरायके, तू बानइत सिरताजु ॥ ४ ॥ जनमको भूखो भिखारी हौं गरीबनिवाजु । पेट भरि तुलसिहि जेंवाइय भगति-सुधा सुनाजु ॥ ५ ॥

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